Tuesday, January 20, 2026
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हिन्दू अध्ययन:सांस्कृतिक संवाद के साथ-साथ रोजगार को प्रोत्साहन

मनुष्य की सभ्यता की कहानी केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारी चेतना, विकास और सांस्कृतिक पहचान का मूल स्रोत है। विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ जैसे – सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया, मिस्र, चीन, यूनान और माया – न केवल अद्भुत स्थापत्य और विज्ञान की जननी रही हैं, बल्कि इन सभ्यताओं ने मानवता को नैतिकता, शासन, कृषि, लेखन और समाज व्यवस्था की नींव प्रदान की। इन सभ्यताओं का अध्ययन केवल अतीत को जानने के लिए नहीं, बल्कि आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों का उत्तर खोजने का एक सशक्त उपाय भी है।


उदाहरण के लिए, सिंधु घाटी सभ्यता की जल निकासी व्यवस्था आज की जल-संकटग्रस्त दुनिया को टिकाऊ शहरी नियोजन का पाठ पढ़ा सकती है। मिस्र की स्थापत्य कला या मेसोपोटामिया की विधिक प्रणाली हमें यह दिखाती है कि मानव रचनात्मकता ने हजारों वर्ष पहले भी चमत्कारी समाधान खोजे थे।

विश्वविद्यालयों और अध्ययन केंद्रों में इन प्राचीन सभ्यताओं पर केंद्रित शोध पुनः लोकप्रिय हो रहा है। जिसमें मुख्य रूप से ‘हिन्दू स्टडीज’, ‘मेसोपोटामिया संस्कृति अध्ययन’, ‘मिस्रविद्या’ और ‘शास्त्रीय चीनी विचार’ जैसे विशेष अध्ययन कार्यक्रम विश्वभर में विद्यार्थियों को संस्कृति, दर्शन, धर्म और प्रौद्योगिकी के ऐतिहासिक पहलुओं से परिचित करा रहे हैं। भारत में भी नवजागरण की तरह युवाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा और वैदिक विज्ञान को समझने की ललक बढ़ रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रावधानों में मुख्य रूप से मातृभाषा को प्रोत्साहन देने के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित मूल्यवर्धक विषयों के शिक्षण पर विशेष ज़ोर दिया गया है। यह समय है जब शिक्षा नीति, अनुसंधान संस्थान और मीडिया मिलकर इस चेतना को प्रोत्साहित कर रहे हैं। हमें केवल विदेशी सभ्यताओं की ओर नहीं, बल्कि भारत की स्वयं की गौरवशाली विरासत जैसे – वेद, उपनिषदों के साथ ही, तक्षशिला, नालंदा शिक्षण संस्थानों व अरण्यक परंपरा, जिसमें आत्मविद्या/ब्रह्मविद्या, उपासना/ध्यान पर ज़ोर दिया जाता है – की ओर भी देखना होगा। इसमें कर्मकांड से हटकर दार्शनिक और आध्यात्मिक विषय शामिल हैं। इस विरासत को विश्व पटल पर पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।

मानव सभ्यता की आत्मा
धर्म को मानव सभ्यता की आत्मा माना जाता है। यह न केवल ईश्वर या आध्यात्मिकता से जुड़ा विषय है, बल्कि यह समाज, संस्कृति, नैतिकता, दर्शन और जीवन पद्धति का भी आधार है। विश्व के प्राचीन धर्म जैसे – वैदिक सनातन परंपरा, जरथुष्ट्र धर्म (पारसी), मिस्र का देवपूजन, यूनानी देवमाला, यहूदी परंपरा, मेसोपोटामिया के देवी-देवता, और ताओवाद आदि – आज भी मानव चेतना को गहराई से प्रभावित करते हैं।

आज जब आधुनिक सभ्यता भौतिक प्रगति की दौड़ में मानसिक और नैतिक द्वंद्वों से जूझ रही है, तब प्राचीन धर्मों का अध्ययन न केवल ऐतिहासिक या धार्मिक जिज्ञासा की पूर्ति करता है, बल्कि यह जीवन को संतुलन, करुणा और एकात्म दृष्टि प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बन सकता है।

अध्ययन की प्रासंगिकता
हिन्दू अध्ययन से विश्व की विभिन्न सभ्यताओं को समझने एवं उनमें संवाद स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जा सकता है। इसमें मुख्य रूप से संस्कृति की समझ विकसित होगी क्योंकि हर समाज की सांस्कृतिक पहचान उसके धार्मिक दृष्टिकोण से गहराई से जुड़ी होती है।

प्राचीन धर्मों का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि सभ्यताओं ने जीवन, मृत्यु, प्रकृति, सृष्टि और आत्मा को कैसे परिभाषित किया। साथ ही यह वैश्विक संवाद और सह-अस्तित्व को प्रोत्साहित करेगा क्योंकि जब हम विभिन्न धर्मों की उत्पत्ति और मूल विचारों को समझते हैं, तब हमें धर्मों के बीच साम्य और संवाद की क्षमता दिखती है। इससे वैश्विक शांति, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना को बल मिलता है।

इसके अलावा धर्म और दर्शन का समन्वय भी विकसित होगा। भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, यह दर्शन, तर्क और योग की पद्धतियों से भी जुड़ा है। वेद, उपनिषद, जैन आगम, बौद्ध त्रिपिटक, और ताओवादी ग्रंथ जैसे ‘ताओ ते चिंग’ हमें जीवन की व्यापक समझ देते हैं जो नैतिक शिक्षा का भी स्रोत है। आज की पीढ़ी को यदि जीवन मूल्यों, कर्तव्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों की समझ देनी है, तो प्राचीन ग्रंथों के विचारों से जुड़ना आवश्यक है।

शिक्षण संस्थानों की भूमिका
वर्तमान में अनेक विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक धर्म, हिन्दू अध्ययन, बौद्ध दर्शन, अब्राहमिक धर्म और स्वदेशी आध्यात्मिकता जैसे पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। हिन्दू अध्ययन के अंतर्गत – हिन्दू परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, दर्शन, वेद, उपनिषद, स्मृति-शास्त्र, योग, पुराण, भक्ति वेदांत, भक्ति आंदोलन, धर्मशास्त्र, रामायण-महाभारत पर अध्ययन एवं शोध – मुख्य रूप से संचालित हो रहे हैं।

ईसाई धर्म केंद्र के अन्तर्गत – ईसाई धर्म का इतिहास, बाइबिल, धर्मशास्त्र, नैतिक दर्शन, प्रोटेस्टेंट, कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स परंपराएं, समाज, राजनीति, मध्यकालीन और आधुनिक ईसाई चिंतन एवं शोध शामिल हैं।

इस्लाम धर्म अध्ययन केंद्र के अंतर्गत – इस्लामी सभ्यता, इतिहास, दर्शन, संस्कृति, कानून, परंपरा, कुरान, हदीस, शरीयत और फ़िक़्ह का गहन अध्ययन किया जाता है।

बौद्ध धर्म केंद्र के अन्तर्गत – बौद्ध धर्म की वैश्विक यात्राएँ, थेरवाद, महायान, वज्रयान परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन, पाली, तिब्बती और संस्कृत ग्रंथों पर शोध के साथ ही भाषायी-सांस्कृतिक विविधता का अध्ययन होता है।

यहूदी धर्म अध्ययन केंद्र के अन्तर्गत – दर्शन, संस्कृति, तोराह, तलमूद, हिब्रू भाषा, यहूदी परंपराएँ, संगीत, कला, हिब्रू ग्रंथों पर अध्ययन व शोध शामिल हैं।

इसी तरह सिख धर्म के दर्शन, संस्कृति, इतिहास, गुरुमुखी, कला, संगीत आदि पर शोध व अध्ययन कई संस्थानों में संचालित हो रहे हैं। भारत में – बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, सांची विश्वविद्यालय, दून विश्वविद्यालय सहित दर्जनों उच्च शिक्षण संस्थान प्राचीन धार्मिक परंपराओं पर उच्चस्तरीय शोध कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में शामिल करने का जो आह्वान किया गया है, वह इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

नवजागरण की आवश्यकता
प्राचीन धर्मों का अध्ययन एक निष्पक्ष, अकादमिक और तात्त्विक दृष्टिकोण से होना चाहिए, जिससे यह किसी संकीर्णता या प्रचार का साधन न बन जाए। यह अध्ययन हमारे युवाओं में जिज्ञासा, तर्क और सहिष्णुता को जन्म देगा।

प्राचीन धर्मों का अध्ययन केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए मार्गदर्शन और भविष्य के लिए चेतना का दीप है। जब हम विश्व के धार्मिक विचारों की विविधता को आत्मसात करते हैं, तब हम एक अधिक समावेशी, सह-अस्तित्व, वैश्विक शांति, वैज्ञानिक समझ के साथ संतुलित एवं समझदार समाज की ओर बढ़ते हैं।

प्रो. एच. सी. पुरोहित
समन्वयक, हिन्दू अध्ययन केन्द्र,
दून विश्वविद्यालय, देहरादून

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