गणेश चतुर्थी का महापर्व. डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह
how to ganesh chaturthi date 2ग26: णेश चतुर्थी का महापर्व हर वर्ष माघ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है माताएं इस व्रत को अपने संतानों की रक्षा और उसके संकट को दूर करने के लिए देवों में प्रथम पूज्य गणेश के लिए करती हैं इसलिए इस संकटा चतुर्थी भी कहा जाता है हर वर्ष इस कठिन व्रत को महिलाओं के द्वारा भोर से लेकर चंद्र उदय तक बिना जल के पिये किया जाता है इसलिए इसे निर्जला व्रत भी कहा जाता है
भारत में हर एक पर्व उत्सव त्योहार पूजा पाठ या व्रत हवन अनुष्ठान के पीछे वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक तथा प्रकृति का दृष्टिकोण छिपा हुआ है इसी तरह ग्रहों में चंद्रमा और सूर्य सर्व प्रधान माने जाते हैं क्योंकि सूर्य जीवन का आधार है और चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट है और वह जीवन को सीधे-सीधे प्रभावित करता है

डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह
बाकी नौ ग्रहों की भी अपनी अपनी कथा है इस बार शुक्रवार के दिन 6 जनवरी मंगलवार को गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी क्योंकि सुबह भोर में 8:01 से उसका आरंभ होगा और 7 जनवरी बुधवार के सुबह 6.52 पर इसका समापन होगा इस व्रत को करने में दूब तिल मौसम के फल और फूल तथा पीले रंग और लाल रंग के वस्त्रो का विशेष महत्व है इसके साथ-साथ मिठाई अगर लड्डू हो तो सबसे अच्छा माना जाता है यदि किसी कारण से चंद्र देव का दर्शन नहीं होता है तो 6 जनवरी को रात में 8:55 पर चंद्रमा को अर्घ दिया जा सकता है *
*गणेश जी की पूजा आराधना करने पर संतान का कष्ट दूर होता है वह स्वस्थ दीर्घायु और यशवान बनता है इस बार गणेश चौथ में श्री गणेश जी की पूजा का विधि विधान है कि स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें और 6 जनवरी को सुबह 8=01 से 9:21 मिनट तक या फिर 11.55 से 12=45 तक गणेश जी की पूजा आराधना या केवल ध्यान करें अगर जरूरी समझे तो गणेश जी के व्रत और कथाओं का भी उल्लेख करें इस बार चंद्रमा के उदित होने का समय जौनपुर और आसपास तथा मध्य भारत में 8=55 पर है इसके बाद अर्घ्य देकर गणेश जी की पूजा की जाती है जिसमें तिल और तिल के बने लड्डू मौसम के फल मिठाई लड्डू दूब का प्रयोग किया जाता है कुछ लोग इसमें कंद मूल भी शामिल करते हैं ध्यान रहे की पूजा में तुलसी के पत्तों का या तुलसी का किसी भी रूप में प्रयोग वर्जित है और जल भी तुलसी के पौधे में नहीं देना चाहिए चंद्रमा के उदय के बाद हर घर देखकर पूजा पाठ करके सादा भोजन या कंदमूल फल खाकर इस व्रत का समापन किया जाता है।
ganesh chaturthi इस कठिन निर्जला व्रत को महिलाएं अपने संतानों के लिए करती हैं इसलिए संतानों को भी चाहिए कि वह अपनी मां के प्रति समर्पित भाव से जीवन पर्यंत उनकी सेवा करके अपना जीवन धन्य बनाएं एक बात और है कि अगर बदली या कोहरा या किसी अन्य कारण से चंद्रमा नहीं दिखते हैं तो रात में 9:30 के बाद चंद्रमा और श्री गणेश का दर्शन करते हुए आराम से पारण व्रत का कर सकते हैं।
गणेश जी बुद्धि और चतुराई के देवता हैं और उनके बल असीमित है बड़े-बड़े राक्षसों का नरसंहार करके और अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करके उन्होंने सभी देवताओं में सबसे पहले पूजित होने का वरदान प्राप्त किया है रिद्धि और सिद्धि उनकी पत्नियों हैं अतः गणेश भगवान के प्रसन्न होने पर रिद्धि सिद्धि धन-धान्य सुख समृद्धि अपने आप घर में आ जाती है एक कथा है कि एक बार देवताओं की सभा में यह विवाद हुआ की सबसे पहले किसकी पूजा हो तो तय किया गया जो लोग तीनों लोकों की प्रदक्षिणा करके सबसे पहले आ जाएंगे उन्हें को प्रथम पूजा का स्थान दिया जाएगा सारे देवता और परम बलशाली कार्तिक देव तीनों लोकों की परिक्रमा करने निकल गए इधर गणेश जी अपने माता-पिता की तीन परिक्रमा करके सामने बैठ गए और एक मत से उनका सबसे पहले पूजनीय देवता माना गया ।
भगवान परशुराम से उनका घनघोर युद्ध हुआ था वेदव्यास जी के महाभारत बोलते समय जब गणेश जी लिख रहे थे उनकी कलम टूट गई तो उन्होंने अपना आधा दांत तोड़कर उसी से महाभारत लिखा था इसीलिए उन्हें एक दंत कहा गया जब उनका गर्दन भगवान शिव ने परम क्रोध में काट दिया और माता सती अत्यंत ही क्रोधित होकर तीनों लोकों का संघार करने निकली तो हाथी के नवजात बच्चे की गर्दन लगाकर भगवान गणेश को जिंदा किया गया इसलिए उन्हें वक्रतुंड कहा जाता है लड्डू या मोदक उन्हें अत्यंत प्रसन्न कर लेता है वह भगवती पार्वती के सबसे प्रिय पुत्र हैं इसलिए गणेश की पूजा करने पर सभी देवी देवताओं भगवान से और माता पार्वती का आशीर्वाद अपने आप मिल जाता है यह सभी कथा गणेश चतुर्थी के दिन जरुर कहना और सुनना चाहिए।





