Jaunpur News जौनपुर |देश के संविधान में सामाजिक समरसता और जाति-विहीन समाज की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में विश्वविद्यालयों में किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण नियम बनाना निरर्थक है। जाति वर्ग या वर्ण के नाम पर नए नियम सामाजिक संतुलन को प्रभावित करते हैं, इसलिए सरकार को इस विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़े नए विधेयक पर अस्थायी रोक लगाए जाने का कई सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने भी स्वागत किया है। दूसरी ओर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि शिक्षा विशेषज्ञों और शिक्षा जगत के एक बड़े वर्ग का कहना है कि यूजीसी से संबंधित यह नया विधेयक समाज के किसी भी वर्ग या समुदाय के विरुद्ध नहीं है। जबकि यह पूरी तरह स्पष्ट है कि ऐसे विधेयक लाने से समाज की आपसी भाईचारे की नीव कमजोर होती है. एक वर्ग दूसरे वर्ग से नफरत करने लगता है. क्या यह समाज के हित में होगा ? इस पर विचार करना बहुत जरूरी है. सवर्णों और अन्य समुदायों बीच यह बहुत बड़ी खाई बन सकती है. इसलिए इस बिल को निरस्त किया जाना चाहिए
वरना समाज में यह संदेश जाएगा कि सवर्ण विद्यार्थी बिल्कुल असामाजिक तत्व की तरह है. उनसे सबको बचा कर रखना है. इससे देश की ऐसी सोच बन जाएगी जो समाज को बांट देगी. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पहले भी मंडल कमीशन के जरिए इस तरह का प्रयास किया गया था और उसका नतीजा पूरे देश ने भोगा था. सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का है कि सरकार ऐसे समय में यह बिल लाई है. जबकि देश विकास की दिशा तय कर रहा है. सबका दिल एकजुट करने की जरूरत है.. यह केवल वोट की राजनीति का स्टंट है केवल वोट की खातिर समाज को बांट देना, समाज में आपसी कलह पैदा कर देना बिल्कुल ही अनुचित है और इसका विरोध किया जाना चाहिए. इस विधेयक को रोक करके सुप्रीम कोर्ट ने एक अच्छा कदम उठाया है लेकिन हमारी मांग है कि यह पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाना चाहिए ताकि समाज की आपसी समरसता बनी रहे और जिस तरह विकास की दिशा में हम बढ़ रहे हैं इस तरह आगे बढ़ते जाएं. आपस में बिना वजह ऐसा बखेड़ा नहीं करना खड़ा करना चाहिए जो समाज हित में नहीं है. यह तो समाज में विघटन पैदा करना है.।




