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डिजिटल युग में महिला सशक्तिकरण

वर्तमान समय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का युग है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। शिक्षा, व्यापार, प्रशासन, स्वास्थ्य और संचार जैसी व्यवस्थाएँ तेजी से डिजिटल माध्यमों पर आधारित होती जा रही हैं। इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहलू यह है कि इससे महिलाओं के सशक्तिकरण को नई दिशा मिली है। डिजिटल तकनीक ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, सूचना और अभिव्यक्ति के ऐसे अवसर प्रदान किए हैं, जिनके माध्यम से वे पहले की अपेक्षा अधिक आत्मनिर्भर और सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल अधिकार प्रदान करना नहीं है, बल्कि महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक रूप से सक्षम बनाना है ताकि वे जीवन के हर क्षेत्र में समान भागीदारी कर सकें। भारतीय समाज में लंबे समय तक सामाजिक परंपराओं, आर्थिक सीमाओं और लैंगिक असमानता के कारण महिलाओं की भूमिका सीमित रही। लेकिन डिजिटल क्रांति ने इस स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने का कार्य किया है।

भारत में इंटरनेट उपयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 90 करोड़ के करीब पहुँच चुकी है। इनमें महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है और लगभग 47 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता महिलाएँ हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल पहुँच का विस्तार हो रहा है और लगभग 48 करोड़ से अधिक ग्रामीण नागरिक इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि डिजिटल तकनीक अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ग्रामीण समाज तक भी पहुँच रही है, जिससे ग्रामीण महिलाओं के लिए भी नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक ने महिलाओं के लिए नए द्वार खोल दिए हैं। ऑनलाइन कक्षाएँ, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म, डिजिटल पुस्तकालय और वेबिनार के माध्यम से महिलाएँ घर बैठे शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण प्राप्त कर सकती हैं। विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए यह सुविधा अत्यंत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक या सामाजिक कारणों से नियमित शिक्षण संस्थानों तक नहीं पहुँच पाती थीं। कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल शिक्षा का महत्व और अधिक स्पष्ट हुआ, जब ऑनलाइन माध्यमों ने शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आर्थिक सशक्तिकरण के संदर्भ में भी डिजिटल तकनीक महिलाओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है। आज अनेक महिलाएँ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपना व्यवसाय स्थापित कर रही हैं। हस्तशिल्प, सिलाई-कढ़ाई, घरेलू खाद्य उत्पाद और पारंपरिक कलाओं से जुड़े कार्यों को महिलाएँ सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स के माध्यम से व्यापक बाजार तक पहुँचा रही हैं। इससे उनकी आय में वृद्धि हो रही है और परिवार की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हो रही है।

भारत में लगभग 90 लाख से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनमें करोड़ों महिलाएँ जुड़ी हुई हैं। ये समूह डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स के माध्यम से अपने उत्पादों को बाजार तक पहुँचा रहे हैं। इसके साथ ही डिजिटल भुगतान प्रणाली जैसे UPI, मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट ने महिलाओं को वित्तीय लेन-देन में अधिक स्वतंत्र बनाया है। अब महिलाएँ स्वयं ऑनलाइन भुगतान, बचत और आर्थिक लेन-देन का प्रबंधन कर रही हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्वायत्तता मजबूत हुई है।

सामाजिक दृष्टि से भी डिजिटल माध्यमों ने महिलाओं को अपनी आवाज़ रखने का प्रभावी मंच प्रदान किया है। सोशल मीडिया के माध्यम से महिलाएँ अपने विचार, अनुभव और समस्याओं को समाज के सामने प्रस्तुत कर सकती हैं। इससे महिला अधिकार, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर व्यापक जागरूकता उत्पन्न हुई है। डिजिटल माध्यमों ने महिलाओं को संवाद और भागीदारी का नया आयाम दिया है, जिसके माध्यम से वे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

हालाँकि डिजिटल युग में महिला सशक्तिकरण की इस प्रक्रिया के सामने कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल विभाजन की है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक महिलाओं के पास व्यक्तिगत मोबाइल फोन या इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। कई मामलों में महिलाएँ परिवार के किसी पुरुष सदस्य के फोन के माध्यम से ही इंटरनेट का उपयोग करती हैं। इसके अतिरिक्त डिजिटल साक्षरता की कमी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है, जिसके कारण कई महिलाएँ तकनीकी संसाधनों का पूरा लाभ नहीं उठा पातीं।

साइबर अपराध और ऑनलाइन उत्पीड़न भी महिलाओं की डिजिटल भागीदारी के लिए एक गंभीर चुनौती है। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी घटनाएँ महिलाओं की सुरक्षा और आत्मविश्वास को प्रभावित करती हैं। इसलिए डिजिटल सशक्तिकरण के साथ-साथ साइबर सुरक्षा और जागरूकता को भी मजबूत करना आवश्यक है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है कि सरकार और समाज मिलकर महिलाओं के बीच डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दें। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएँ लागू की जानी चाहिए। साथ ही महिलाओं को तकनीक के सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के बारे में जागरूक करना भी अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डिजिटल युग महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर लेकर आया है। यदि डिजिटल संसाधनों की समान उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, तो डिजिटल क्रांति महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। एक समावेशी और समानतापूर्ण समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि डिजिटल विकास की प्रक्रिया में महिलाओं की समान और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

लेखक: अज़ीम सिद्दीकी
संवाददाता: अमर उजाला (खेतासराय)
ईमेल: azim3027@gmail.com

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