46 साल पहले तत्कालीन सरपंच किशोरी लाल गुप्ता ने रखी थी नींव, आज खेतासराय की सांस्कृतिक पहचान बना आयोजन
पहले वाराणसी से मंगाई जाती थीं प्रतिमाएं, अब स्थानीय स्तर पर मूर्तिकार देते हैं मां दुर्गा को आकार
खेतासराय (जौनपुर): कस्बे में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा का इतिहास 46 वर्ष पुराना है। वर्ष 1980 में एक छोटे से पंडाल से शुरू हुआ आस्था का सफर आज खेतासराय थाना क्षेत्र के 63 स्थानों तक पहुंच चुका है। समय के साथ पूजा का स्वरूप और आयोजन की भव्यता बदलती गई, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं आई। कभी सीमित संसाधनों और चंद लोगों के सहयोग से शुरू हुआ आयोजन अब कस्बे की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1980 में कस्बे के तत्कालीन सरपंच एवं समाजसेवी स्व. किशोरी लाल गुप्ता ने की थी। उनकी पहल पर श्री नवयुवक दुर्गा पूजा समिति के तत्वावधान में पहली बार मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई। उस दौर में न भव्य पंडालों का प्रचलन था और न ही आकर्षक विद्युत सजावट की सुविधा। बावजूद इसके लोगों ने आपसी सहयोग से आयोजन को सफल बनाया।
स्व. किशोरी लाल गुप्ता के पुत्र डॉ. अमलेन्द्र गुप्ता बताते हैं कि उनके पिता ने सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत के लिए काफी प्रयास किए थे। पहली प्रतिमा वाराणसी के मूर्तिकार निर्मल दास के यहां से मंगाई गई थी। प्राकृतिक सजावट से तैयार पहला पंडाल लोगों के आकर्षण का केंद्र बना था। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते थे।
शुरुआती वर्षों में खेतासराय में दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण नहीं होता था। पूजा समितियों को वाराणसी, मऊ और घोसी से प्रतिमाएं मंगानी पड़ती थीं। परिवहन और बढ़ते खर्च के कारण आयोजकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसे देखते हुए स्व. किशोरी लाल गुप्ता ने मूर्तिकारों को कस्बे में बुलाकर प्रतिमा निर्माण कराने की पहल की। धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर प्रतिमाएं तैयार होने लगीं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद निवासी मूर्तिकार उत्तम पाल करीब तीन दशक से खेतासराय में दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण कर रहे हैं। बांस, पुआल और मिट्टी से तैयार उनकी प्रतिमाएं आज कई पूजा पंडालों की शोभा बढ़ाती हैं।
नगर में दस और ग्रामीण क्षेत्रों में सजते हैं 63 पंडाल
वर्तमान में खेतासराय थाना क्षेत्र के 63 स्थानों पर सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। इनमें करीब दस पंडाल नगर क्षेत्र में, जबकि 53 आसपास के ग्रामीण इलाकों में स्थापित किए जाते हैं। नवरात्र के दौरान कस्बे के प्रमुख मार्गों, बाजारों और मोहल्लों में विशेष सजावट की जाती है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी पर पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। आकर्षक विद्युत झालरों, भव्य प्रवेश द्वारों और मां दुर्गा की प्रतिमाओं के दर्शन के लिए दूरदराज से लोग पहुंचते हैं।
जय मां विंध्यवासिनी समिति की सजावट बनी आकर्षण
कस्बे की जय मां विंध्यवासिनी दुर्गा पूजा समिति ने आकर्षक पंडाल और सजावट के लिए विशेष पहचान बनाई है। समिति को उत्कृष्ट सजावट के लिए दुर्गा पूजा महासमिति की ओर से कई बार सम्मानित किया जा चुका है। अन्य समितियां भी आपसी सहयोग से आयोजन को भव्य बनाने में योगदान देती हैं।
खेतासराय की दुर्गा पूजा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन चुकी है। पंडालों की तैयारियों और व्यवस्थाओं में स्थानीय व्यापारियों, समाजसेवियों और नागरिकों का सहयोग रहता है। कस्बे की गंगा-जमुनी तहजीब की झलक भी आयोजन में दिखाई देती है। कोरोना महामारी के दौरान वर्ष 2020 में सार्वजनिक आयोजनों पर प्रतिबंध और सीमित व्यवस्थाओं के बावजूद पूजा की परंपरा जारी रही। भव्यता भले कम हुई, लेकिन श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहा।
पुरखों की विरासत संभाल रही नई पीढ़ी
वर्ष 1980 से शुरू हुई परंपरा अब नई पीढ़ी के हाथों में है। जिन बुजुर्गों ने कभी पहला पंडाल सजाने में सहयोग किया था, उनमें से कई अब नहीं रहे। उनकी स्मृतियां आज भी इस आयोजन से जुड़ी हैं। युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक और आकर्षक सजावट के माध्यम से आयोजन को नया स्वरूप दे रही है। प्रतिमा विसर्जन के समय श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं और मां के अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है।
स्व. किशोरी लाल गुप्ता की ओर से 46 वर्ष पहले शुरू की गई सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा आज खेतासराय की सांस्कृतिक विरासत बन चुकी है।





