महात्मा गांधी टाईम्स ऑफ इंडिया,हरिजन समेत 10 अखबार जिनसे वे जुड़े रहे

पत्रकार महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि

संपादक श्यामनारायण पाण्डेय

Mahatma Gandhi: महात्मा गांधी बैरिस्ट,राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध सेनानी ना होते तो वे 20वीं शताब्दी के महानतम संपादक होते उन्हें छात्र जीवन से ही विविध विषयों की अच्छी-अच्छी पुस्तक पढ़ने का शौक था। जिन कॉलेजों के वे छात्र रहे वहा के लाइब्रेरियन गांधी जी से खींझ जाते थे और कहते कि यह छात्र कहां-कहां से ढूंढ- ढूंढ कर पुस्तकों की सूची ले आता है। सत्य तो यह है कि शायद ही देश का कोई ऐसा नेता हो जो गांधी जी जितनी पुस्तक पढ़ी हो।

गांधी जी के विभिन्न अखबार हैं जिनसे वे जुड़े रहे

1- अंग्रेंजी साप्ताहिक इंडिया – गांधी जी 1891 में लंदन से वकालत की डिग्री लेने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के लिए परेशान हो रहे थे उन्हीं दिनों लंदन में उन्हें दादा भाई नौरोजी मिले जो लंदन से अंग्रेजी समाचार पत्र इंडिया निकलते थे उन्हें नौरोजी ने डरबन, जोहानिसबर्ग और दक्षिण अफ्रीका का संवाददाता नियुक्त कर दिया। वह वहां से भारतीयों की समस्याओं के बाबत लगातार समाचार और लेख लिखने लगे।

2 – टाईम्स आफ इंडिया – टाइम्स आफ इंडिया में महात्मा गांधी 1900 से मुंबई संस्करण के लिए दक्षिण अफ्रीका से खबरें भेजने लगे। 16 जून 1900 को बोअर युद्ध पर तथा सेना के स्वास्थ्य की टुकड़ी की समस्या पर जो खबरें भेजी गई दुनिया में चर्चित हुई।

3- इंडियन ओपिनियन – गांधी जी की प्रेरणा से ही 1903 में डरबन दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले मदनजीत ने दक्षिण अफ्रीका से ही इंडियन ओपिनियन नाम से साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्र हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती और तमिल भाषा में प्रकाशित होता था। 1904 में गांधी जी ने इन पत्रों के संपादन का कार्य स्वयं ही ले लिया। उनका लक्ष्य था कि केवल अपने निजी लाभ के लिए कोई मनुष्य या सरकार या कंपनी किसी व्यक्ति या जाति को रंगभेद के आधार पर नैतिक दृष्टि से दास नही बना सकता है और न ही शोषण कर सकता है।

4- सत्याग्रही – महात्मा गांधी की प्रेरणा से 1907 में डॉ० मानिक लाल ने गुजराती भाषा में हिंदुस्तानी नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन अहमदाबाद से शुरू किया। बाद में इसका नाम सत्याग्रही कर दिया गया। इसके उद्देश्य के बारे में गांधी जी ने घोषित किया कि व्यक्तिगत स्वाधीनता, मानव मैत्री, बंधुत्व तथा सभी जातियों में सामान्यता जीवन की आवश्यक शर्त है। यह अखबार 1919 में रॉलेट एक्ट का विरोधी पत्र बनकर देश और विदेशों में भी में चर्चित हुआ। जबकि यह पत्र पंजीकृत नहीं था।

5- नवजीवन (गुजराती)- वर्ष 1919 में ही गांधी जी ने अहमदाबाद से नवजीवन का प्रकाशन शुरू किया। इसकी भाषा सरल सुबोध और प्रवाह मान थी। असहयोग आंदोलन का क्रांतिकारी प्रभाव तथा गुजरातियों में नवीन चेतना का उदय हो यही इस पत्र का उद्देश्य था। यह पत्र 1932 में बंद हो गया। अब फिर प्रकाशित हो रहा है

6- यंग इंडिया– यह पत्र अहमदाबाद से ही 1919 में अंग्रेजी साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित किया गया। महात्मा गांधी स्वयं इसके संपादक थे। उद्देश्य था भारतीयों में आजादी की भूख जगाना । आपके किसी भी पत्र में विज्ञापन नहीं छपता था गांधी जी का कहना था कि मेरे पत्र न मनोरंजन के लिए हैं ना किसी व्यक्ति या वस्तु को प्रशंसा के लिए छपते हैं। ये पत्र लोगों में स्वतंत्र चेतना जागृत करने के लिए हथियार के रूप में काम करते हैं।

7- हिंदी नवजीवन – नवजीवन का प्रशासन व्यापक करने के लिए हिंदी संस्करण की शुरुआत गांधी जी ने 30 सितंबर 1921 से किया। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के लिए और अन्य चीजों के बहिष्कार के लिए प्रतीकात्मक विरोध करना इस पत्र का उद्देश्य था। इसमें हिंदी भाषा में खबरें लेख आचरण की शुद्धता के लिए शाकाहार के बारे में भी लिखा जाता था। अंग्रेजों की जन विरोधी नीतियों का यह पत्र खुलकर विरोध करता था। अखबार में भारतीय समस्याओं जैसे – जाति प्रथा, छुआछूत, मद्यपान, दहेज कूप्रथा, अहिंसा आदि पर लेख लिखा जाता था। आपका कहना था कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार होने के साथ-साथ ही हमारी संपत्ति भी है।

8 –अंग्रेजी साप्ताहिक हरिजन – 17 फरवरी 1933 से गांधी जी ने पुणे से अंग्रेजी साप्ताहिक अखबार हरिजन का प्रकाशन शुरू किया। संपादक तो आर० वी० शास्त्री थे और प्रकाशक व स्वामी हरिजन सेवक संघ नामक संस्था थी जिसके अध्यक्ष- घनश्याम दास बिडल थे। इसके प्रकाशन का उद्देश्य था अछूतों का उद्धार और हरिजन की समाज में स्वीकार्यता बने। संघ हरिजन छात्रों को वजीफा भी देता था और उनकी बेहतरी के लिए बराबर प्रयास करता रहता था। यह पत्र काफी दिन तक चला।

9- हरिजन सेवक– अपने संदेशों को व्यापक रूप से हिंदी भाषा बोलने व पढ़ने वालों के लिए प्रसारित करने के लिए गांधी जी ने हिंदी में हरिजन सेवक नाम का साप्ताहिक अखबार निकाला इसके संपादक तो वियोगी हरि थे किंतु यह गांधीजी का ही का था। जो उन्होंने हरिजनों के उत्थान के उद्देश्य को पूरा करने के लिए जन-जन तक प्रसारित करने की व्यवस्था की।

10- सर्वोदय – यह पत्र अगस्त 1938 में वर्धा (महाराष्ट्र) से प्रकाशित किया गया। इस हिंदी साप्ताहिक संपादक- काका कालेलकर थे और दूसरे संपादक दादा धर्माधिकारी भी थे। सत्याग्रह का कार्यक्रम क्या है इसकी तात्विक चर्चा करके उसका शुद्धतम रूप में प्रचार हो और उसके प्रति जन जन की स्वीकार्यता बढे यह गांधी जी का उपदेश था। यह गांधी जी का प्रिय अखबार था किंतु आर्थिक तंगी के नाते बहुत दिनों तक नहीं चल सका।

गांधी जी के संवाद व आलेख की विशेषताएं

गांधीजी बड़े साहसी और न थकने वाले पत्रकार थे वे दोनों हाथों से स्पष्ट और सुंदर लिपि में लिखते थे वह नाव पर, जहाज पर, सकरी गलियों में, रास्तों पर चलते हुए, मोटर गाड़ी पर और बेल गाड़ियों पर बैठकर भी लिखा करते थे। दाहिना हाथ जब लिखते लिखते थक जाता था तब वह बाएं हाथ से लिखने लगते थे। 1916 में जब भी दक्षिण अफ्रीका से भारत आ रहे थे उन्होंने जहाज में ही हिंद स्वराज नामक अपनी मशहूर पुस्तक का लेखन कर डाला। यह भारत में बहुत ही प्रसिद्ध हुई। उर्दू पत्रिका में 23 मार्च 1914 वाले अंक में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने गांधी जी के लेखन के बारे में तारीफ करते हुए लिखा है कि- गांधी जी जबरदस्त लिक्खाड थे। उनकी लेखन शैली बड़ी सरल, सुस्पष्ट और दिल के तारों को छूने वाली होती थी। उनकी अंग्रेजी की ड्राफ्टिंग के बारे में कई वायस राय और बड़े अधिकारी कहते थे कि गांधी जी की ड्राफ्टिंग बेजोड़ है। उसकी कोई सानी नहीं है। वे प्रीपोजिशन और व्याकरण के विषय में शत प्रतिशत शुद्धता रखते हैं। यही कारण है उनके आलेखों में कभी लाल निशान नहीं लगाया जा सका।

एक अंग्रेज लेखक सरपैथिक लॉरेंस के अनुसार ,भारत में गांधी जी से बड़ा अंग्रेजी का कोई लेखक नहीं है। उनके लेखन में एक भी वाक्य बेवजह नहीं होते थे। वह ऐसा लिखते थे मानो कोई सामने बैठकर बातें कर रहा हैं।

सर ए० वी० अलेक्जेंडर के अनुसार, गांधी जी के संपादकीय लेखों का एक – एक अंश “थॉट फॉर द डे” के लिए मुनासिब था। हर वाक्य पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता था कि लिखने से पूर्व उसे 10-10 बार तोला गया है।

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