कश्मीर के हिन्दू राज्य का इतिहास -डॉ दिलीप कुमार सिंह
कश्मीर दो शब्दों से मिलकर बना है क: +समीर जिसका अर्थ है जल और वायु अर्थात संपूर्ण धरती पर कश्मीर की हवा और पानी सबसे शुद्ध ताजी और स्फूर्ति दायक थी ऐसा इसलिए था कि हिमालय पर्वत पर बर्फ से ढके शिखरों से आने वाला पानी तमाम खनिज पदार्थ और जड़ी बूटियों से मिलकर अमृत के समान स्वास्थ्यवर्धक हो जाता था और वही हाल वहां की हवा का भी रहता था शुभ्र स्वच्छ बर्फ को छूकर बहती हवा केसर जड़ी बूटियों और तमाम औषधियों से संयुक्त होकर अत्यंत सुगंधित ऑक्सीजन से ओतप्रोत हो जाती थी।
इस प्रदेश की स्थापना परम प्रतापी ब्रह्मा के पुत्र कश्यप ब्रह्म ऋषि ने किया था और उन्हीं के नाम पर कैस्पियन सागर का नाम भी पड़ा जिसको पहले कश्यप सागर कहा करते थे और उसकी खोज सर्वप्रथम फौजी स्वभाव वाले कश्यप जी ने ही किया था कश्मीर एक विशाल राज्य था जिसकी सीमाएं वर्तमान में अफगानिस्तान कजाकिस्तान कैलाश मानसरोवर से होती हुई आधे पंजाब और हिमाचल प्रदेश तक फैली हुई थी और इसका क्षेत्रफल लगभग 1500000 वर्ग किलोमीटर में था सतयुग त्रेता और द्वापर युग में बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि संत महात्मा और दार्शनिक लोगों की तपस्थली थी और यहां पर अनेकानेक राजसूय यज्ञ हुए भगवान श्री राम के और युधिष्ठिर के छोड़े गए अश्व भी वहां गए जहां पर उस समय के राजाओं से उनका घनघोर युद्ध हुआ था महा योद्धा किरात यहीं के निवासी थे जिनके वेश में अर्जुन से भगवान शिव ने स्वयं घनघोर युद्ध किया था
आज जो कश्मीर भारत में है और जिस कश्मीर की बात हम करते हैं वह धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर नहीं है वह असली कश्मीर का केवल एक चौथाई है असली कश्मीर तो पाकिस्तान आजाद कश्मीर मुजफ्फराबाद में है दुनिया की सबसे सुंदर जड़ी बूटियां सबसे स्वच्छ ताजा पानी और स्वास्थ्यवर्धक फल फूल मिलते हैं और यहां रहने वाले लोग आराम से 100 वर्ष तक जीते हैं 1988 89 में मुझे ईश्वर की कृपा से आजाद कश्मीर एक सप्ताह जाने का मौका प्राप्त हुआ और वहां की असाधारण अद्भुत और कल्पना से परे का सौंदर्य देखकर हो गया था उसके बाद कश्मीर में भयानक याद पहले और सब कुछ तहस हो गया बचा हुआ कश्मीर तो केवल कहने के लिए है और श्रीनगर तक के भूभाग ही धरती का स्वर्ग कहे जाने योग्य है।
कश्मीर और भारत दोनों के इतिहास की सही और प्रामाणिक जानकारी अत्यंत आवश्यक है।प्राचीन काल में भारत का क्षेत्रफल मुख्य भूभाग का लगभग 25000000 और किलोमीटर था और है आधे अरब प्रायद्वीप पूरे ईरान कैस्पियन सागर से होता हुआ अरब और उससे अलग हुए मुस्लिम गणराज्य और एक तिहाई चीन संपूर्ण तिब्बत को लेते हुए म्यांमार थाईलैंड लाओस वियतनाम सिंगापुर मलेशिया इंडोनेशिया श्रीलंका तक फैला हुआ था इसके अलावा अमेरिका और यूरोप ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका अंटार्कटिका उस समय जंगली राज थे और वहां भी भारत का शासन था धीरे धीरे सम्राट जन्मेजय के बाद भारत की सीमाएं सिकुड़ना आरंभ हुई और अंतिम बार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में भारत का राज्य मक्का मदीना और तुर्की तक फैला हुआ था कश्मीर सदैव से भारत का सबसे बड़ा और सबसे सबसे सुंदर और पवित्र राज्य था।
अखंड कश्मीर से ही उत्तर भारत के सभी प्रमुख नदियां जैसे सिंधु ब्रह्मपुत्र झेलम रवि व्यास सतलज चिनाव निकलते हैं जो सदैव अपनी से भारी जड़ी बूटियां से युक्त स्वच्छ और ताजी होती है संसार की सबसे ऊंची 20 चोटियों में से 15 तो केवल कश्मीर में ही हैं
पहले का विराट कश्मीर तक फैला हुआ था जिसमें कैलाश मानसरोवर यक्ष गंधर्व और देवता लोक था।यहीं पर ऋषि मुनि तपस्या करते थे और अनंत ब्रह्मांड के रहस्य खोज लेते थे यहीं से सुमेरु का शिखर दिखाई देता था और यही से स्वर्ग का रास्ता जाता था यहां पर सिद्ध योगी तपस्वी रहते हैं जो हजारों लाखों वर्ष के हैं डॉ दिलीप कुमार सिंह
भगवती पार्वती ने यही के हिमवान शिखर पर दक्ष के पुत्री के रूप में जन्म लिया और अपने प्रदेशों के अपमान होने पर खुद को यज्ञ में स्वागत कर दिया और प्रजापति दक्ष का यज्ञ विध्वंस हो गया था।कश्मीर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली था लेकिन धीरे-धीरे उसे वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने विदेशी साजिश के तहत धूल धूल सहित कर दिया और यहां तक कह दिया कि परम पवित्र दिव्य अमरनाथ की गुफा एक मुस्लिम गडरिया खोजी थी जो पूरी तरह झूठी बात है जब पांडव लोग हिमालय पर चढ़ते हुए स्वर्गारोहण किए थे उस समय दिया गुफा विद्यमान थी या ज्ञान विज्ञान कला कौशल धर्म-दर्शन और वेद पुराण स्मृतियों का मुख्य केंद्र यहीं पर था यहीं पर अर्जुन दिग्विजय करते हुए आए थे और यहां से आगे उत्तरी ध्रुव तक गए थे
कल्हण के राजतरंगिणी से ज्ञात होता है। अशोक के पुत्र जालौक को कश्मीर में हिन्दू सभ्यता के प्रसार का श्रेय है । कनिष्क के समय कश्मीर कुण्डल वन के नाम से जाना गया। कश्मीर में कार्कोटवंश उत्पलवंश लोहारवंश के शासकों ने शासन किया। कार्कोट वंश में क्रमशः दुर्लभवर्धन चन्द्रापीड तारापीठ मुक्तापीड । सबसे प्रतापीय ललितादित्य हुआ कश्मीर को सजाने एवं संवारने का कार्य अधिक किया । उसने कश्मीर की सीमाओं को ईरान उत्तराखंड और तिब्बत तक पहुंचा दिया था और अब देश के आक्रमण का भीषण प्रतिकार किया थाकश्मीर में सूर्य का मार्तण्ड मंदिर उसी के समय में बना । उसके बाद जयपीड शासक हुआ। उत्पलवंश में अवन्तिवर्मन शंकरवर्मन गोपाल वर्मन इसी के समय यश्कर नामक व्यक्ति ने शासन सम्हाला उसके बाद रानी दिद्दा का शासन हुआ जो दुराचारी महिला थी ।
जम्मू और कश्मीर के फल फूल जड़ी बूटियां केसर और शिल्प तथा कला अद्भुत हैं और यहां के निवासी भी गोरे चिट्टे लंबे कद के होते हैं यहां की झीलों में बिहार करना अपने आप में नंदनकानन और स्वर्ग में बिहार करने जैसा है और बाग बगीचे सुगंधित उद्यान अपने आप में एक प्रतिमान है कला साहित्य त्याग तपस्या हर क्षेत्र में कश्मीर पहले सिरमौर और भारत का मुकुट था लोहार वंश में संग्राम राज अनंत कलश व हर्ष उच्छल सुस्सल भिक्षाक्षर जय सिंह राजतरंगिणी का विवरण जयसिंह के शासन के साथ समाप्त हो जाता है। कश्मीर में 1339 ई में मुस्लिम शासन की स्थापना होती है।
इसके बाद कई कालखंड आए और धीरे-धीरे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ती गई और हिंदू अल्पसंख्यक हो गए लेकिन 200 वर्षों के बाद कश्मीर में फिर से सनातनी धर्म का शासन हो गया जो 1947 तक रहा एक बार फिर से महान सेवा नायक हरि सिंह नलवा ने इसकी सीमाओं को चीन तक फैला दिया था।और महाराजा हरी सिंह के साथ समाप्त हुआ यद्यपि इसके बाद भी वहां पर राजे रजवाड़े बचे हैं ।सम्राट ललितादित्य के बाद से ही यहां पर मुस्लिम घुसपैठ शुरू हुई और आज वहां 99% मुसलमान है। नेहरू के चलते कश्मीर आज पूरी तरह से मुस्लिम राज्य बन चुका है जिसको फिर से कश्मीरी सनातनी लोगों से बसाने का प्रयास जारी है राजनीति कुर्सी और मुस्लिम देशों की खिचड़ी के चलते कश्मीर आज अधर में झूल रहा है देखना है कब इसको अगले ललितादित्य या हरि सिंह नलवा प्राप्त होते हैं




