वेतन की माँग पर सचिवों की अनिश्चितकालीन हड़ताल
गेहूँ की बोआई से पहले डीएपी और यूरिया का संकट गहराने की आशंका
खेतासराय (जौनपुर): एक तरफ खेतों में रबी की फसल की तैयारी तेज हो रही है, तो दूसरी तरफ खाद वितरण करने वाली साधन सहकारी समितियों पर ताले लटक रहे हैं। वेतन की माँग को लेकर सहकारी समितियों के सचिव लखनऊ में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। इसका सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। डीएपी और यूरिया की आस में समितियों तक पहुँचने वाले अन्नदाताओं को बन्द दरवाजे देखकर मायूस लौटना पड़ रहा है।
क्षेत्र की जैगहां, जमदहां, खेतासराय, मानीकलां, खुदौली और मनेछा स्थित साधन सहकारी समितियों पर तालाबंदी से खाद वितरण व्यवस्था प्रभावित हो गई है। सचिवों की हड़ताल के चलते समितियों का कामकाज ठप पड़ा है। ऐसे में किसानों के सामने खाद की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बन गया है।
सबसे अधिक चिंता उन किसानों को सता रही है, जो रबी की बोआई के लिए खेत तैयार करने में जुटे हैं। गेहूँ की बोआई का समय नजदीक आने के साथ डीएपी की जरूरत बढ़ने लगी है। वहीं अन्य फसलों के लिए यूरिया की आवश्यकता बनी हुई है। ऐसे में सहकारी समितियों के बंद होने से किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
किसानों की परेशानी यह है कि जिस सहकारी समिति से उन्हें निर्धारित दर पर खाद मिलने की उम्मीद रहती है, वहाँ ताले लटक रहे हैं। खाद की तलाश में उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। हड़ताल लंबी खिंची तो किसानों को निजी दुकानों का सहारा लेना पड़ सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ने की आशंका भी गहरा गई है।
सहकारी समितियों के सचिव अपनी वेतन संबंधी मांगों को लेकर राजधानी लखनऊ में धरना दे रहे हैं। आंदोलन अनिश्चितकालीन होने के कारण समितियों के दोबारा खुलने को लेकर असमंजस बना हुआ है। उधर, किसानों के सामने सवाल यह है कि आखिर उनकी खेती का समय निकलने से पहले खाद की व्यवस्था कौन करेगा?
कृषि कार्य मौसम और समय पर निर्भर होते हैं। बोआई में देरी का असर फसल की पैदावार पर पड़ सकता है। ऐसे में समितियों की तालाबंदी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। क्षेत्र में एक साथ कई साधन सहकारी समितियों के बन्द होने से खाद वितरण व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। किसानों की जरूरत और सचिवों के आंदोलन के बीच प्रशासन के सामने अब वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने की चुनौती है।
सचिवों की मांगों का समाधान कब होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। फिलहाल खेतों में पसीना बहाने वाला अन्नदाता खाद के लिए परेशान है। सवाल यह है कि वेतन की लड़ाई और व्यवस्था की खींचतान के बीच आखिर किसान कब तक पिसता रहेगा?







